RSR In hindi Rajasthan seva niyam in hindi राजस्थान सेवा नियम हिन्दी में

अध्याय – 1

सामान्य परिचय
राजस्थान सेवा नियम (आर.एस.आर.)

नियम 1: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत प्रत्येक राज्य को अपने राज्य में सरकारी सेवा के संचालन के लिए कुछ नियम व उपबंध बनाने का अधिकार है।

➤ 23 मार्च 1951 की अधिसूचना के आधार पर राजस्थान सेवा नियम (आर.एस.आर.) राजस्थान में 01.04.1951 से प्रभावी हुई।

➤ आरएसआर के नियम राज्यपाल के कार्यकारी आदेश हैं तथा राजस्थान के समस्त कर्मचारियों पर लागू होते हैं।

अपवाद जिन पर राजस्थान सेवा नियम लागू नहीं होते हैं:—

  1. राजस्थान में नियुक्त केंद्र सरकार के कर्मचारी।
  2. यदि कोई कर्मचारी, जो अन्य सेवा का हो लेकिन प्रतिनियुक्ति के आधार पर राज्य में नियुक्त है।
  3. राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्य।
  4. राजस्थान उच्च न्यायालय में नियुक्त न्यायाधीश।
  5. वे कर्मचारी जिनका विपरीत परिस्थितियों में भुगतान आकस्मिक निधि से हो।
    आकस्मिक निधि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 267(2) के तहत संचालित होती है।
  6. संचित निधि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266(1) के तहत संचालित होती है।

नियम 7:– परिभाषाएँ:—

नियम 7(1): आयु – आयु से तात्पर्य उस दिन से है, जिस दिन से कर्मचारी अपने पद से पदोन्नत, पदावनत या सेवा निवृत्त होता है तथा यह दिन उसका अकार्य दिवस माना जाएगा।

नियम 7(2): शिक्षार्थी – इससे तात्पर्य आरएसआर में उस कर्मचारी से है, जो स्थायी पद के विरुद्ध कुछ सीमा तक मासिक वेतन के आधार पर नियुक्त किया जाए।

नियम 7(3): संविधान – भारतीय संसद द्वारा 26.11.1949 को अंगीकृत किया गया कानून संविधान कहलाता है।

नियम 7(4): संवर्ग – स्थायी पद का प्रतिनिधित्व करने वाला वर्ग संवर्ग कहलाता है।

नियम 7(4) (ए):— चतुर्थ श्रेणी सेवा: आरएसआर में ग्रेड पे 1700–1800 को निरूपित करने वाला कर्मचारी।

नियम 7(5):— क्षतिपूरक भत्ते: ऐसे भत्ते जिनका प्रारम्भिक भुगतान स्वयं कर्मचारी द्वारा किया जाता है तथा फिर इनकी पूर्ति सरकार द्वारा कर्मचारी को कर दी जाती है।

नियम 7(6):— सक्षम अधिकारी: परिशिष्ट 9 भाग 2 के तहत आने वाले सभी कर्मचारी, जो वित्तीय शक्तियों का उपयोग कर सकते हैं।

नियम 7(7):— संचित निधि: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266(1) के तहत निर्धारित निधि।

नियम 7(7) (ए):— रूपान्तरित अवकाश: नियम 93 के तहत आने वाले अर्द्धवेतन अवकाशों को रूपान्तरित अवकाश में परिवर्तित किया जा सकता है।

नियम 7(8):— कर्तव्य: इससे तात्पर्य किसी कर्मचारी के सरकारी सेवा करने से है। परिवीक्षाधीन अवधि, अवकाशों की अवधि सदैव कर्तव्य में आती है।

नियम 7(8) (ब):— भारत में ही कर्मचारी को प्रशिक्षण पर भेजा जाता है तो उसे ड्यूटी माना जाता है।

नियम 7(8) (स):— एपीओ की अवधि ड्यूटी के तहत मानी जाती है।

नियम 7(8) (द):— सक्षम प्राधिकारी की अनुमति से किसी ऐसी विभागीय परीक्षा में उपस्थित होता है, जिसके उत्तीर्ण होने से कार्य कुशलता में वृद्धि हो, तो ऐसी अवधि कर्तव्य की अवधि है।

नियम 7(9):— शुल्क: संचित निधि के अलावा अन्य निधि से प्राप्त होने वाली आय शुल्क कहलाती है।
नोट: नियम 64 के तहत प्राप्त भुगतान शुल्क है।

नियम 7(10):— वैदेशिक सेवा: ऐसी सेवा जिसमें कर्मचारी को भुगतान संचित निधि के स्थान पर स्थानीय निधि से प्राप्त हो, वैदेशिक सेवा कहलाती है।

नियम 7(10) (ए):— राजपत्रित अधिकारी: वर्गीकरण नियंत्रण अपील नियम 1958 की धारा 1 में आने वाले समस्त अधिकारी राजपत्रित अधिकारी होते हैं।

नियम 7(10) (ब):— अर्द्ध-वेतन: अर्द्ध-वेतन से तात्पर्य नियम 93 के तहत दिए जाने वाले अवकाश से है।

नियम 7(11):— विभागाध्यक्ष: परिशिष्ट 14 भाग 2 के तहत आने वाले समस्त अधिकारी विभागाध्यक्ष होते हैं।

नियम 7(12):- सार्वजनिक अवकाश: ऐसे अवकाश जो सरकार देती है अर्थात ऐसे अवकाश जो सरकार द्वारा किसी अधिसूचना के आधार पर घोषित हो।
नियम 7(13):- मानदेय:- मानदेय सदैव सरकारी कर्मचारी को कोई सामयिक कार्य करने पर देय होता है।
नियम 7(14):- पदभार ग्रहण काल:- 1981 नियमों के तहत कर्मचारी का एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरण होने पर दिया जाने वाला समय पदभार ग्रहणकाल कहलाता है।
नियम 7(15):- अवकाश:- कर्मचारी द्वारा अपने खाते से लिये गये अवकाश।
नियम 7(16):- अवकाश वेतन:- कर्मचारी द्वारा जिस प्रवृत्ति का अवकाश लिया जाता है, उसी के अनुरूप उसे वेतन देय है। (नियम 97)
नियम 7(17):- पदाधिकार:- स्थायी पद पर स्थायी रूप से नियुक्त होने पर कर्मचारी का उस पद पर पदाधिकार होता है।
नियम 7(18):- स्थानीय निधि:- भारतीय संविधान के अनु. 268(2) के तहत निर्धारित होने वाली निधि स्थानीय निधि कहलाती है।
नियम 7(19):- मंत्रालयिक कर्मचारी:- परिशिष्ट 12 के तहत आने वाले कर्मचारी, मंत्रालयिक कर्मचारी है। (लिपिक श्रेणी)
नियम 7(20):- माह:- माह से तात्पर्य कैलेण्डर वर्ष की एक ईकाई से है।
नियम 7(21):- दिनांक 01.01.1995 को विलोपित।
नियम 7(22):- स्थायी कर्मचारी:- इससे तात्पर्य आरएसआर में अपने पद पर स्थायी अधिकार रखने वाला कर्मचारी है।
नियम 7(23):- स्थानापन्न:- इससे तात्पर्य उन कर्मचारियों से है, जिन्हें अपने पद के साथ-साथ अतिरिक्त पद की जिम्मेदारी दी जाती है।
नियम 7(24):- वेतन:- वेतन से तात्पर्य आरएसआर में किसी सरकारी कर्मचारी को मिलने वाली मासिक राशि से है।
नियम 7(25):- पेंशन:- कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति पश्चात् मिलने वाली मासिक राशि जो सरकार भुगतान करें।
नियम 7(26):- स्थायी पद:- ऐसे पद जिनकी कोई समय सीमा आरएसआर में निर्धारित नहीं होती है।
नियम 7(27):- व्यक्तिगत वेतन:- किसी कारणवश यदि सरकारी कर्मचारी के वेतन श्रृंखला में कोई कटौती होती है तथा एक निश्चित समय सीमा तक उस कटौती का लाभ पुनः दिया जाये, उसे व्यक्तिगत वेतन कहते है।
नियम 7(28):- उपार्जित अवकाश:- सेवा में व्यतीत किये गये समय के आधार पर अर्जित किये गये अवकाश उपार्जित अवकाश की श्रेणी में आते है। (नियम 91 के तहत)
नियम 7(29):- पद का परिकल्पित वेतन:- ऐसा वेतन सदैव उसी अवस्था में देय होता है, जब कर्मचारी को अपने पद के अलावा किसी अतिरिक्त पद का अधिकार सौंपा जायें। ऐसा वेतन देने या ना देने का अधिकार सदैव वित्त विभाग की अनुशंसा के आधार पर होता है।
नियम 7(30):- परिवीक्षाधीन:- दिनांक 20.01.2006 के बाद राजस्थान सरकार द्वारा ऐसे किसी भी पद पर नियुक्ति नही होती है। ऐसे कर्मचारी को नियत वेतन देय होता है।
नियम 7(30)(ए):- परिवीक्षाधीन प्रशिक्षणार्थी:- दिनांक 20.01.2006 के बाद स्थायी पद पर दो वर्ष के लिए अस्थायी रूप से नियुक्ति होती है।
नियम 7(31):- विशेष वेतन:- यदि कोई सरकारी कर्मचारी सेवा में रहते हुए कोई विशेष उपलब्धि अर्जित करे, उसे वित्त विभाग की सलाह पर विशेष वेतन देय होता है।
नियम 7(32):- उच्च सेवा:- आरएसआर में चतुर्थ श्रेणी सेवा को छोड़कर समस्त सेवा उच्च सेवा है।
नियम 7(33):- निर्वाह अनुदान:- कर्मचारी के निलम्बित होने पर सरकार द्वारा कर्मचारी को देय मासिक अनुदान निर्वाह अनुदान कहलाता है।
नियम 7(34):- मूल वेतन:- कर्मचारी की वेतन श्रृंखला में ग्रेड पे के जुड़ने के बाद उसके मूल वेतन का निर्धारण होता है।
नियम 7(35):- स्थायी नियुक्ति:- ऐसी नियुक्ति जिस पर कार्य करने वाले कर्मचारी का एक निश्चित पदाधिकार होता है।
नियम 7(36):- सावधि पद:- सामान्य तौर पर ऐसे पद एक निश्चित अवधि तक सृजित किये जाते है तथा इन पर कार्य करने वाले कर्मचारी का उस पद पर पदाधिकार जुड़ा रहता है।
नियम 7(37):- समय वेतनमान:- कर्मचारी की वेतन श्रृंखला समय वेतनमान सदैव निम्न स्तर से उच्च स्तर की ओर जाता है।
नियम 7(38):- स्थानान्तरण:- इससे तात्पर्य कर्मचारी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर नियुक्ति देने से है।
नियम 7(39):- विश्रामकालीन विभाग:- ऐसे विभाग जिनमें एक निश्चित समय सीमा तक मुख्यालय बंद रहते है। जैसे न्यायिक विभाग, शिक्षा विभाग, कृषि विभाग।
नियम 7(40):- पेंशन के अयोग्य संस्थापन्न:- ऐसे कर्मचारियों को वेतन व भत्ते का निर्धारण सरकारी बजट के अलावा सरकार के किसी अन्य स्रोतों से किया जाता है।

अध्याय-3


सेवा की सामान्य शर्तें
(नियम 8 से 23(ब) तक)

नियम 8:- प्रेवेशनर प्रशिक्षार्थी:- स्थाई पद पर दो वर्ष के लिए अस्थाई नियुक्ति।
➤ 13 मार्च 2006 की अधिसूचना के आधार पर ये नियम 20 जनवरी 2006 से प्रभावी हुआ।
➤ इसमें कर्मचारियों को 02 वर्ष के लिए एक स्थिर पारिश्रमिक मिलता है तथा उनके स्थिर मानदेय पर कोई कटौती नहीं होती। इन्हें किसी प्रकार का अवकाश देय नहीं होता।
(नियम 103 की सीरीज को छोड़कर)

नियम 8(ड):- प्रथम नियुक्ति के समय आयु—(16 से 35 वर्ष):- सामान्य तौर पर नई नियुक्ति की आयु 16–35 वर्ष मानी है, प्रतिनियुक्ति से जुड़े मामलों में 18–35 वर्ष मानी गई है।
➤ दिनांक 24.05.2004 के बाद महिलाओं हेतु अधिकतम आयु 42 वर्ष मानी गई है।
➤ दिनांक 06.03.2012 के बाद राजस्थान राज्य एवं अधीनस्थ सेवा में अधिकतम आयु 45 वर्ष कर दी गई है।
➤ देवस्थान विभाग के पुजारियों हेतु अधिकतम आयु किसी भी परिस्थिति में 35 वर्ष के बाद नहीं की जाएगी।
➤ दिनांक 25.11.1996 से अनु. जाति/अनु. जनजाति को अधिकतम आयु में 05 वर्ष की छूट तथा ओ.बी.सी. को 03 वर्ष की छूट दी जायेगी।
➤ आरक्षित वर्ग की महिला को दिनांक 24.02.2007 से अधिकतम आयु में 10 वर्ष की छूट।

नियम 8(ब) नाम परिवर्तन:- इस नियम के तहत एक निर्धारित प्रपत्र में सूचनाएं एकत्रित करके कर्मचारी द्वारा कार्यालय अध्यक्ष को दी जायेगी तथा कार्यालयाध्यक्ष इन्हें एजी कार्यालय प्रेषित करेगा। तत्पश्चात एजी के द्वारा सत्यापन की सम्पूर्ण जानकारी राजस्थान के राजपत्र में प्रकाशित होने के बाद कर्मचारी का नाम परिवर्तन हो जायेगा।
प्रथम नियुक्ति के समय वेतन बिल की जांच कोषाधिकारी करते हैं।

नियम 9:- नई नियुक्ति पर चिकित्सा प्रमाण पत्र:- इस नियम के तहत कर्मचारी की किसी भी सेवा में नई नियुक्ति होने पर उसे चिकित्सकीय कारणों से स्वस्थ होने का प्रमाण पत्र देना होगा।

नियम 10:- चिकित्सा प्रमाण पत्र का प्रारूप:- इस नियम के तहत सरकार द्वारा चिकित्सा प्रमाण पत्र का प्रारूप तैयार किया गया है।

नियम 11:- चिकित्सा प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर एवं प्रतिहस्ताक्षर करने वाला:-
चिकित्सा प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर जिले स्तर पर राजकीय अस्पताल के पीएमओ द्वारा किये जाते हैं। किसी राजकीय अस्पताल के विभागाध्यक्ष को भी कुछ सीमा तक चिकित्सा प्रमाण पत्र जारी करने की छूट है।

नियम 12:- चिकित्सा प्रमाण पत्र से किसको छूट है:-

  1. वे सभी भर्तियां जो पहले ही शारीरिक परीक्षण के दौर से गुजरे।
  2. सेवानिवृति की तिथि के बाद तुरन्त ही पुन: नियुक्त होने वाले कर्मचारी।
  3. चतुर्थ सेवा से ऊपर उच्च सेवा तक के अस्थायी कर्मचारियों को 03 माह तक की छूट।
  4. महिला कर्मचारियों की चिकित्सा जांच के समय चिकित्सा बोर्ड में एक महिला चिकित्सक अनिवार्य।

नियम 13:- सेवा की आधारभूत शर्तें:-
इस नियम के तहत प्रत्येक सरकारी कर्मचारी 24 घण्टे सरकार को अपना समय देगा तथा दैनिक कर्तव्य से अधिक किये गये कर्तव्य के बदले वह भुगतान हेतु कोई दावा प्रस्तुत नहीं कर सकता।

नियम 14:- एक पद एक व्यक्ति का सिद्धान्त:-
इस नियम के तहत एक स्थायी पद पर एक समय में एक ही व्यक्ति कार्य करेगा।
अस्थायी पदों में एक समय में दो या दो से अधिक व्यक्ति कार्य कर सकते हैं।

नियम 15:- पदाधिकारी:-
स्थायी पद पर स्थायी रूप से नियुक्ति।

नियम 16:- पदाधिकारी कब तक बना रहेगा:-

  1. अवकाश के दौरान।
  2. निलम्बित अवस्था के दौरान।
  3. विदेश सेवा के मामले में कर्मचारी 03 साल तक अपने पद पर रहता है।

नियम 17:- पदाधिकारी का निलम्बन:-
यदि कर्मचारी के विरुद्ध सिविल नियम 1958 के तहत कार्यवाही की जाये तो कर्मचारी को पदाधिकारी से निलम्बित किया जा सकता है।

नियम 18:- पदाधिकारी को समाप्त करना:-
यदि कर्मचारी पर सिविल नियम 1958 के तहत कार्यवाही की गई हो तथा वह दोषी पाया जाये तो उसका पदाधिकारी समाप्त हो जायेगा।
दिनांक 20.08.2001 के बाद यदि कर्मचारी लगातार 05 साल से अवकाश पर हो तो उसे पद से बर्खास्त कर दिया जायेगा।

नियम 19:- पदाधिकारी का स्थानान्तरण:-

  1. सरकार के सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए।
  2. दिनांक 20.08.2005 के बाद सरकार द्वारा किया गया पदाधिकारी का स्थानान्तरण जनहित में होना आवश्यक है।
  3. यदि सरकार कर्मचारी पर कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही करे तो पदाधिकारी का स्थानान्तरण करें।

अध्याय-10

अवकाश की सामान्य शर्तें (नियम 57 से 86)



नियम 57:- अवकाश केवल कर्तव्य सम्पादन से अर्जित होते है:- (दिनांक 11.01.56)
इस नियम के तहत प्रत्येक विभाग में किसी भी कर्मचारी को अवकाश उसके कर्तव्य के अनुरूप ही देय होता है।


नियम 57 (अ):- पूर्व के विभागों में की गई ऐसी सेवा जहां आरएसआर लागू नही होती तो पूर्व की सेवा का लाभ आरएसआर के तहत अवकाश के सम्बन्ध में लागू नहीं होता है।


नियम 58:- क्षतिपूर्ति / अयोग्यता पेंशन के मामले में अवकाश अवधि की गणनाः- इस नियम के तहत यदि कर्मचारी सेवाकाल में किसी अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान अयोग्यता अर्जित कर लेता है तो उसकी पिछली सेवा को अवकाश अवधि के तहत माना जावेगा।


नियम 59:- अवकाश अधिकार नहीं हैः- दिनांक 21.03.1967 से लागू । अधिकारी को यह अधिकार है कि वह अवकाश के नियंत्रण दावों में कमी व अस्वीकृत कर सकता है। एक कर्मचारी के लिए गये अवकाश की प्रवृति अधिकतम 03 माह तक बदल सकता है। आवेदित अवकाश की प्रवृति केवल अवकाश चाहने वाला ही बदल सकता है।


नियम 60 :- अवकाश प्रारम्भ तथा अन्तः- अवकाश की शुरूआत उस दिन से होती है जिस दिन से कर्मचारी अपने पद का कार्यभार किसी अन्य को सुपुर्द कर दे। अवकाश की समाप्ति कर्मचारी के कार्यग्रहण के 01 दिन पूर्व होती है।


नियम 61 :- अवकाश स्थान का पता :- इस नियम के तहत कर्मचारी अवकाश के लिए आवेदन करते समय आवेदन पत्र पर अपने अवकाश काल के दौरान रहने वाले पते का ब्यौरा देगा।


नियम 62:- छूट देने की शक्तिः- इस नियम के तहत अवकाश के पहले व बाद सार्वजनिक अवकाश का उपयोग वहीं कर्मचारी कर सकते है, जो अपने कार्य भार का हस्तांतरण किसी अन्य कर्मचारी को करते है। विकट परिस्थिति में हस्तान्तरण नहीं करने वाले कर्मचारियों को भी इससे छूट होती है।


नियम 63 :- अवकाश के साथ सार्वजनिक अवकाशों के संयोजन की व्यवस्था:- इस नियम के तहत यदि अवकाश पर जाने से पहले कोई सार्वजनिक अवकाश हो तो उसका कर्मचारी के वेतन व अवकाश पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यदि अवकाश से पुनः आते समय कोई सार्वजनिक अवकाश हो तथा कर्मचारी ने कार्यभार हस्तान्तरण नहीं किया हो तो उस सार्वजनिक अवकाश का कर्मचारी के वेतन व अवकाश वेतन पर असर पड़ेगा।
दिनांक 15.09.1998 से कर्मचारी एक वर्ष में दो ऐच्छिक अवकाश (RH) ले सकता है।

नियम 64: – अवकाश पर नियोजन स्वीकार करना:- व्यापार निषेध अवकाश काल में कर्मचारी ऐसा कोई कार्य नहीं कर सकता, जिसके तहत उसे आर्थिक रूप से फायदा हो तथा अवकाश काल में कर्मचारी ऐसा करता है तो अनुशासनात्मक कार्यवाही की जायेगी ।
अपवादः – यदि कोई कर्मचारी साहित्यिक गतिविधि कर रहा है तो इससे प्राप्त आय इस नियम के तहत मानी जायेगी। पेशे से जुड़े मामलों में कर्मचारी को एक समय सीमा तक नियोजन करने की अनुमति प्रदान की जाती है।
वैदेशिक सेवा में नियम 64 के प्रावधान लागु नहीं होते है ।


नियम 65 :- सेवानिवृति तिथि के बाद अवकाश की अस्वीकृतिः- इस नियम के तहत यदि कोई कर्मचारी सेवानिवृति तिथि से पहले अवकाश पर चला जाता है तथा इस अवकाश के दौरान सरकार द्वारा उसका कार्यकाल बढ़ा दिया जाता है तो वह कर्मचारी उसी दिन से ऑन ड्यूटी मान लिया जाता है जिस दिन कार्यकाल बढ़ाने के आदेश जारी हुए है तथा कर्मचारी के शेष अवकाश को आगे की सेवा में समायोजित कर दिया जाता है।


नियम 66 :- अवकाश से कर्मचारी को वापस बुलाना:- इस नियम के तहत यदि कर्मचारी को अवकाश से वापस बुलाया जावे तो यदि वापिस आने की आवेदन पत्र में अनिवार्य शर्त हो तो कर्मचारी पत्र प्राप्त होते ही ऑन ड्यूटी हो जायेगा तथा वापिस आते समय यात्रा व समस्त सुविधायें सरकारी खातें पर करेगा।
नोट:- लेकिन कर्मचारी इस अवधि के दौरान अवकाश वेतन ही प्राप्त करता है। यदि वापिस आना कर्मचारी के स्व-विवेक पर हो तो उसे किसी प्रकार के यात्रा व सुविधायें देय नहीं होगी।


नियम 67 :- अवकाश आवेदन पत्र का प्रारूप:- इस नियम के तहत अवकाश पर जाने वाला कर्मचारी एक निर्धारित प्रपत्र में अपना आवेदन सक्षम अधिकारी को देगा ।


नियम 68 :- वैदेशिक सेवा के अवकाश नियमों की जानकारी:- वैदेशिक सेवा में स्थानान्तरित किसी भी राज्य कर्मचारी को वैदेशिक सेवा में जाने से पूर्व उन सभी नियमों की जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए जिनसे वैदेशिक सेवा के दौरान उसका अवकाश आदि नियमित होगा ।


नियम 69: – (दिनांक 11.05.1962) वैदेशिक सेवा में 120 दिन से ज्यादा के उपार्जित अवकाश लेना चाहे तो उसे अपना अवकाश आवेदन प्रपत्र महालेखाकार कार्यालय में प्रेषित करना होगा तथा आवेदन पत्र की जांच के बाद ही वैदेशिक नियोजक द्वारा उसे अवकाश दिया जावेगा ।


नियम 70 :- राजपत्रित अधिकारियों को चिकित्सा प्रमाण पत्र का प्रारूप (दिनांक 07.09.2010 के बाद से) इस नियम के तहत राजपत्रित अधिकारियों को चिकित्सा सम्बन्धी अवकाशों के लिए आवेदन पत्र का प्रारूप है।


नियम 71-72 :- विलोपित (दिनांक 05.12.1980 से )

नियम 73 :- (दिनांक 05.12.1980 से लागु) संदिग्ध मामलों में 14 दिन की मेडिकल अभिरक्षा:- राजपत्रित अधिकारियों को चिकित्सा सम्बन्धी अवकाश के लिए सक्षम अधिकारी द्वारा 14 दिन की मेडिकल अभिरक्षा रखने का प्रावधान है।


नियम 74:- (दिनांक 05.12.1992) राजपत्रित अधिकारियों को चिकित्सा प्रमाण पत्र अवकाशः-

  1. इस नियम के तहत सामान्य तौर पर किसी राजपत्रित अधिकारी को चिकित्सा प्रमाण पत्र पर 60 दिन का अवकाश देय है।
  2. यदि राजपत्रित अधिकारी सीएमएचओ स्तर का चिकित्सा प्रमाण पत्र प्रस्तुत करें तो अवधि 60 से 90 दिन तक बढ़ाई जा सकती है।
  3. यदि राजपत्रित अधिकारी अन्तः रोगी हो तो जब तक वह अस्पताल में भर्ती है तब तक उसे अवकाश स्वीकृत कर सकते है ।
  4. दिनांक 16.10.1989 के बाद राजपत्रित अधिकारियों को 15 दिन का अवकाश होम्योपैथिक चिकित्सक भी स्वीकृत कर सकते है।
  5. राज्य सिविल सेवा चिकित्सा परिचर्या नियम 2008 के तहत कुछ निजी अस्पतालों को भी राजपत्रित अधिकारियों के ईलाज के लिए अधिकृत किया गया है।
  6. दिनांक 01.01.2004 के बाद आपातकाल की परिस्थितियों में सामान्य तौर पर निजी अस्पतालों को भी राजपत्रित अधिकारियों के लिए अधिकृत किया गया है।

नियम 75 :- चिकित्सा प्रमाण पत्र अवकाश का अधिकार नहीं है।
नियम 76 :- अराजपत्रित अधिकारियों को चिकित्सा प्रमाण पत्र पर अवकाश:- (दिनांक 30.06.1980 से लागू) अराजपत्रित अधिकारी आरएमपी (रजिस्टर्ड मेडिकल प्रेक्टिशनर) चिकित्सक से लिया गया प्रमाण पत्र प्रस्तुत करे तो अवकाश देय है।
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नियम 77 :- चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को चिकित्सा प्रमाण पत्र पर अवकाश:- इस नियम के तहत चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को किसी भी स्तर का चिकित्सा प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने पर अवकाश देय होता है।
नियम 78:– अयोग्यता पर अवकाश अस्वीकृत करना:- इस नियम के तहत चिकित्सक को यदि लगे कि उसके द्वारा जिस कर्मचारी को अवकाश स्वीकृत किया जा रहा है वह इसके लिए अयोग्य है तो वह उसके अवकाश की सिफारिश नही करता है।
नियम 79: – इस नियम के तहत चिकित्सक कर्मचारी के आवेदन पत्र पर यह स्पष्ट रूप से अंकित करता है कि इसके द्वारा अवकाश में की गई अनुशंषा कर्मचारी का अधिकार नहीं है।

नियम 80 :- अवकाश के दावों के निस्तारण में प्राथमिकताः-

  1. अवकाश के दावों के निस्तारण में सार्वजनिक हित को ध्यान में रखा जाता है।
  2. कर्मचारी के अवकाश खाते की प्रवृति को देखते हुए अवकाश स्वीकृत किये जाते है।
  3. कर्मचारी का यह व्यक्तिगत दायित्व है कि वह अपने उपार्जित अवकाश के लेखे का संधारण करें।
  4. कर्मचारियों की आकस्मिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सक्षम अधिकारी अपने विवेक के अनुरूप अवकाश स्वीकृत करने का अधिकार रखता है।
  5. विभागाध्यक्ष कर्मचारी द्वारा अपने अवकाश के लिए बताये गये कारण की अपने स्तर पर समीक्षा कर सकता है।

नियम 81 :- (दिनांक 28.09.1957 से) प्राथमिक दृष्टि में मेडिकल रूप से अयोग्य कर्मचारी के अवकाश की स्वीकृतिः –

  1. अवकाश खाते में अवकाश होने पर) इस नियम के तहत यदि चिकित्सक को लगे कि अवकाश पर जाने वाला कर्मचारी मेडिकल रूप से अयोग्य है तो वह उसके अवकाश लेखे की समीक्षा के आधार पर अधिकतम 12 माह का अवकाश स्वीकृत कर सकता है तथा 06 माह बाद उस कर्मचारी का पुनः मेडिकल परीक्षण करने के बाद आगे की अवकाशों की आज्ञा जारी कर सकता है।
  2. नियम 82:- बर्खास्त / निलम्बन के मामले में अवकाश की अस्वीकृतिः – सक्षम अधिकारी का दायित्व है कि कर्मचारी के निलम्बन काल में किसी भी प्रकार का अवकाश स्वीकृत नहीं किया ज
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नियम 83:- स्वस्थ होने का प्रमाण पत्र:-

  1. दिनांक 05.12.1980 से इस नियम के अधिकारी का यह दायित्व है कि वह चिकित्सीय आधार पर अवकाश पर गये कर्मचारी के लौटने पर स्वस्थ होने का प्रमाण पत्र प्राप्त करें।

नियम 84 :- विलोपित

नियम 85 :- (दिनांक 14.07.1955 से) नियत तिथि से पूर्व अवकाश से लौटना:-

इस नियम के तहत कर्मचारी अवकाश समाप्ति की अवधि से पहले पुनः विभाग में अवकाश स्वीकृता प्राधिकारी की अनुमति के बिना नहीं लौट सकता है।

नियम 86:- अवकाश समाप्ति के बाद अनुपस्थिति या दुराचरणः- (दिनांक 12.01.1976 से )

    इस नियम के तहत यदि कर्मचारी नियत तिथि के बाद भी अवकाश पर से न लौटे तो सक्षम अधिकारी उसकी पिछली सेवा को जब्त कर सकता है।

    इस नियम के तहत यदि कर्मचारी नियत तिथि के बाद के समय का कोई उचित कारण बताये तो उस अवधि को असाधारण अवकाश के तहत माना जा सकता है।

    वर्गीकरण नियंत्रण अपील नियम के तहत यदि कर्मचारी 30 दिन से ज्यादा अनुपस्थिति दर्ज करता है तो उस पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जावेगी तथा इसके तहत सेवा से निलम्बन या बर्खास्त भी किया जा सकता है।

    दिनांक 20.08.2001 के बाद यदि कर्मचारी निरन्तर 05 वर्ष से अधिक अनुपस्थित रहे तो तत्काल प्रभाव से उसे बर्खास्त कर दिया जावेगा।

    अध्याय – 11
    अवकाश देने में प्राथमिकता (नियम 87 से 126 )


    नियम 87 :- इस नियम के तहत अवकाश केवल स्थायी कर्मचारियों को ही देय होते है । नोटः– अस्थायी कर्मचारियों को अवकाश सरकार की अधिसूचना के आधार पर दिये जाते है। अस्थायी कर्मचारियों के समस्त अवकाश सरकारी नियमों व मानकों के अनुरूप ही देय होते है ।
    नियम 87 (अ):- अवकाश लेखाः- राज्य कर्मचारी का अवकाश लेखा परिशिष्ट 2 क में दिये गये प्रपत्र संख्या 1 में संधारित किया जायेगा ।
    नियम 87 ( ब ) :- इस नियम के तहत राजपत्रित अधिकारियों के अवकाश लेखे नियम 160 ( 2 ) के तहत आने वाले अधिकारी रखते है ।
    अराजपत्रित अधिकारियों के अवकाश लेखे उस विभाग के कार्यालयाध्यक्ष या विभागाध्यक्ष द्वारा रखे जाते है।
    नियम 88 :- अवकाश की निरन्तरता में अन्य अवकाशों का संयोजनः – इस नियम के तहत कर्मचारी अपने अवकाशों की निरन्तरता में अन्य अवकाशों का समायोजन उचित प्रमाण पत्र देकर कर सकता है।
    नियम 89 :- सेवानिवृति के पश्चात् किसी भी प्रकार के अवकाश देय नहीं होगें ।
    नियम 90 :- विलोपित
    नियम 91: – उपार्जित अवकाश (पी.एल ):- (दिनांक 22.02.1983 से)

    पी.एल. की देयता सदैव कलैण्डर वर्ष में ही होती है।
    पी.एल. सदैव एक कलैण्डर वर्ष में 02 बार ही दी जाती है। एक जनवरी को 15 व 01 जुलाई को 15 कुल 30 पी.एल देय होती है।
    दिनांक 01.01.1998 के पश्चात् एक कर्मचारी अपने खाते में अधिकतम 300 पी. एल. जमा रख सकता है।
    आरएसी बटालियन के कर्मचारियों को एक कैलेण्डर वर्ष
    किसी कर्मचारी की माह के बीच में नियुक्ति होने पर 21/1⁄2
    42 पी. एल. देय होती है। पी.एल. प्रतिमाह व आर.ए.सी के
    कर्मचारियों को 32 पी. एल. प्रतिमाह के हिसाब से देय होती है।
    एक कर्मचारी एक बार में अधिकतम 120 पीएल ले सकते है । > विशेष परिस्थितियों (टी.बी., असाध्य रोग) में कर्मचारी अपनी समस्त पी.एल. का उपयोग एक साथ कर सकता है।

    नियम 91(अ):- सेवा में रहते हुए पी. एल. के बदले नकद भुगतान (दिनांक 01.01.1983 से)-
    इस नियम के तहत सेवा में रहते हुए कर्मचारी एक वर्ष में अधिकतम 15 पीएल का नकद भुगतान प्राप्त कर सकता है तथा शेष पी. एल. अपने खाते में जोड़ सकता है।
    दिनांक 18.06.2010 के बाद एक अस्थायी कर्मचारी को अपने विभाग में न्युनतम एक वर्ष की सेवा पूर्ण करने पर ही इस नियम का लाभ दिया जावेगा ।
    नियम 91 (ब):- सेवानिवृत होने पर पी.एल. का भुगतान:- इस नियम के तहत कर्मचारी के सेवानिवृत होने पर उसको अपने अवकाश खाते की समस्त पी. एल. का भुगतान तुरन्त प्रभाव से एक मुश्त कर दिया जाता है।
    पी.एल. का भुगतान करते समय मकान भत्ते को छोड़कर समस्त प्रकार के भत्ते देय होते है।
    नियम 91(स):– कर्मचारी की मृत्यु होने पर पी. एल. का भुगतान:- (दिनांक 01.10.1996)
    इस नियम के तहत सेवा में रहते हुए यदि किसी कर्मचारी की मृत्यु हो जाये तो उसके खाते में शेष पी.एल. का भुगतान उसके परिवारजनों को कर दिया जाता है।
    नोट: – दिनांक 20.08.2001 के बाद यदि किसी कर्मचारी पर सीसीए नियम 1958 के तहत कार्यवाही प्रस्तावित है तथा वह कर्मचारी सेवानिवृत हो जाता है तो तुरन्त प्रभाव से भुगतान रोका जायेगा।
    नियम 92 :- विश्रामकालीन विभागों के लिए पी.एल. की देयता:- (दिनांक 01.10.1994 से) विश्रामकालीन न्यायिक कर्मचारियों को एक कैलेण्डर वर्ष में 12 पीएल देय है यदि पी.एल. का उपभोग न करे तो 18 पीएल देय होती है।
    I
    विश्रामकालीन शिक्षा विभाग के कर्मचारियों को 15 पी.एल. देय है।
    नियम 93:- अर्द्धवेतन अवकाश / रूपान्तरित अवकाश की देयता:-

    1. चिकित्सा कारणों के आधार पर एक वित्तीय वर्ष में किसी कर्मचारी के खाते में 20 HPL देय होती है।
    2. कर्मचारी अपनी सुविधा अनुरूप इन HPL को पूर्ण अवकाश में परिवर्तित कर सकता है। 3. एक कर्मचारी अपने सेवाकाल में अधिकतम 480 HPL को रूपान्तरित अवकाश में परिवर्तित कर सकता है।
    3. विशेष मामलों में यदि कर्मचारी के खाते में किसी भी प्रकार की HPL बकाया नही है तो कर्मचारी को अदेय अवकाश का लाभ दिया जा सकता है।
      अदेय अवकाशः- ऐसा अवकाश सक्षम अधिकारी द्वारा तभी स्वीकृत किया जाता है जब कर्मचारी की स्थिति चिकित्सा दृष्टिकोण से सही नही है।
      अदेय अवकाश अधिकतम 360 एचपीएल तक स्वीकृत होता है।
      नियम 93 (ए):- टी.बी. के मामलों में (पुलिस सेवा) यदि कर्मचारी के खाते में किसी भी प्रकार का अवकाश शेष नहीं है तो 360 एचपीएल को उसके खाते में अग्रिम रूप से जमा कर दिया जाता
      है।
      नोटः– यदि कर्मचारी कोई सार्वजनिक हित में पाठ्यक्रम करे तो उसके अवकाश खाते में एचपीएल की बकाया स्थिति को ध्यान में रखते हुए 180 दिन की एचपीएल स्वीकृत होगी।

    नियम 94 :- सेवा समाप्ति अवकाश:- ऐसे अवकाश सामान्य तौर पर अस्थाई कर्मचारियों को ही स्वीकृत किये जाते है। सक्षम अधिकारी ऐसे अवकाशों को अपने विवेक के आधार पर स्वीकृत कर सकता है। इस नियम के तहत शिक्षार्थी को यह लाभ देय नही होता है।
    नियम 95 :- अवकाश अवधि सेवा व्यवधान नही है:- सामान्य तौर पर यदि कोई अस्थायी कर्मचारी अपने पद के समान संवर्ग में ही स्थायी रूप से नियुक्त है तो उसकी पिछली सेवा अवकाश अवधि के तहत माना जायेगा ।
    नियम 96 :- असाधारण अवकाशः- साधारण तौर पर कर्मचारी असाधारण अवकाश तभी स्वीकृत कराता है, जब उसके अवकाश खाते में किसी भी तरह के अवकाश शेष न हो ।
    दिनांक 26.02.2002 के बाद अस्थायी कर्मचारी को असाधारण अवकाश तभी मिलता है, जब उसने 03 वर्ष की सेवा की है।
    अस्थायी कर्मचारियों को अधिकतम 18 माह का असाधारण अवकाश देय है।
    |
    दिनांक 01.01.2007 के बाद परिवीक्षाधीन अवधि में अधिकतम 03 माह का असाधारण अवकाश देय है।
    विपरीत परिस्थितियों में असाधारण अवकाश परिवीक्षाधीन कर्मचारियों को 03 माह से अधिक भी स्वीकृत है।
    03 माह से अधिक यदि कोई कर्मचारी असाधारण अवकाश ले तो अधिक ली गई अवधि उसके परिवीक्षाधीन काल को प्रभावित करती है।
    नियम 97: – अवकाश वेतन की राशि:- सामान्य तौर पर अवकाश वेतन की राशि अवकाश की प्रवृति के तहत ही निर्धारित होती है।
    नियम 98 :- विलोपित
    नियम 99 :- विशेष असमर्थता अवकाशः – ( दिनांक 14.12.12 के बाद) घर से कार्यालय व कार्यालय से घर ड्यूटी नही माना गया है।
    दिनांक 18.05.2010 के बाद चुनाव में ड्यूटी घर से निकलते ही मानी जाती है। इस नियम के तहत सरकारी कर्मचारी को कार्यस्थल पर यदि कोई क्षति हो जाती है तो क्षति होने के तीन माह तक आवेदन पत्र देकर विशेष असमर्थता अवकाश का लाभ उठा सकता है।
    सामान्य तौर पर विशेष असमर्थता अवकाश अधिकतम 24 माह तक देय होता है।
    यदि 24 माह उपरांत भी कर्मचारी की स्थिति में कोई सुधार न हो तो चिकित्सा रिपोर्टो के आधार पर अवधि को आगे बढ़ाया जा सकता है।
    विशेष असमर्थता अवकाश के दौरान वेतन:-
    उच्च सेवा में 120 दिन अवकाश –
    पूर्ण वेतन
    उच्च सेवा में 120 दिन से अधिक अवकाश-
    अर्द्ध वेतन
    चतुर्थ श्रेणी सेवा में 60 दिन अवकाश –
    पूर्ण वेतन
    चतुर्थ श्रेणी सेवा में 60 दिन से अधिक अवकाश – अर्द्ध वेतन

    नियम 100: – असमर्थता अवकाश के दौरान सरकार द्वारा कोई क्षतिपूर्ति भत्ता स्वीकृत होने पर वेतन में कटौती:- इस नियम के तहत यदि असमर्थता अवकाश के दौरान क्षतिपूर्ति भत्ता मिले तो भत्ते के बराबर की राशि कर्मचारी के वेतन में से काट ली जाती है।
    कर्मचारी के व्यक्तिगत बीमा दावों पर इस नियम का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
    नियम 101:- सैनिक / भूतपूर्व सैनिक कर्मचारियों को विशेष असमर्थता अवकाश का लाभ:-
    नियम 102:– नियम 101 के अनुसार ही परन्तु दूघर्टना सैन्य सेवा के अतिरिक्त हुई हो:-
    नियम 103:– प्रसुति अवकाशः – (दिनांक 06.12.2004 से प्रभावी) महिला कर्मचारियों को सम्पूर्ण सेवाकाल में 02 बार अधिकतम 180 दिन का प्रसुति अवकाश मिलता है। 02 बार के बाद भी कोई संतान जीवित न हो तो एक बार और मिल सकता है

    दिनांक 11.10.2008 के बाद प्रसुति अवकाश अवधि 135 दिन से बढ़कर 180 दिन की गई है।
    दिनांक 06.12.2004 के बाद ये अवकाश अस्थायी महिला कर्मचारी को भी देय है। किसी भी कर्मचारी को पूर्ण वेतन व भत्ते देय है।
    सामान्य तौर पर गर्भपात पर यह अवकाश स्वीकृत नहीं किया जा सकता है।
    चिकित्सा रिपोर्ट के आधार पर विपरीत परिस्थितियों में 06 सप्ताह तक का अवकाश स्वीकृत किया जा सकता है। (दिनांक 14.07.2006 के बाद से)
    नियम 103 (अ):- पितृत्व अवकाशः – (दिनांक 06.12.2004 से) किसी पुरूष के प्रथम दो संतानों पर उसे बच्चे के जन्म के 15 दिन पूर्व व 03 माह के भीतर 15 दिन का अवकाश मिलता है।
    नियम 103 (ब):- दत्तक अवकाश:- (दिनांक 07.12.2011 से ) किसी महिला कर्मचारी को 180 दिन का अवकाश सेवाकाल में दो बार ही । 01 साल से कम आयु के बच्चे को गोद लेने पर मिलता है।
    नियम 104 :- प्रस्तावित अवकाश की निरन्तरता में अन्य अवकाशों का संयोजन:-
    नियम 105: – पृथक श्रेणी का अवकाश / चिकित्सालय अवकाश की सीमा:- सामान्य तौर पर यह अवकाश उन्हीं कर्मचारियों को स्वीकृत होता है, जो राज सरकार के लिए किसी हानिकारक संयंत्रों या हानिकारक प्रयोगशाला में नियुक्त हो ।
    ये अवकाश चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को ही लागु होता है।
    नियम 106 :- नियम 105 के अवकाश उन्हीं कर्मचारियों को स्वीकृत होते है जिनका वेतनमान
    12000 रू तक देय हो। (दिनांक 01.01.2007 से लागु) दिनांक 12.09.2008 के आधार पर सभी वेतन वृद्धियां मान्य।
    नियम 107 :- विलोपित

    नियम 108 :- अवकाश की निरन्तरता में अन्य अवकाशों का संयोजन:-
    नियम 109:- अध्ययन अवकाशः- आरएसआर में नियम 109 से 121 (ए) तक है।
    नियम 110: – अध्ययन अवकाश की देयता:- किसी भी कर्मचारी को अपने सम्पूर्ण सेवा काल में अधिकतम 02 वर्ष का अध्ययन अवकाश स्वीकृत किया जा सकता है।
    एक बार में अधिकतम 12 माह का अध्ययन अवकाश स्वीकृत किया जा सकता है।
    नियम 111 :- विलोपितः-
    नियम 112 :- अध्ययन अवकाश स्वीकृत करने की शर्तें:-

    अध्ययन अवकाश राज्य सरकार के सभी कर्मचारियों को देय 1
    अस्थायी कर्मचारी जो विभाग में न्यूनतम 03 वर्ष की सेवा पूर्ण कर चुके हो तथा ऐसी अस्थायी नियुक्तियां आरपीएससी की अभिशंषा के आधार पर होनी अनिवार्य है।
    20 वर्ष से ज्यादा सेवा पूर्ण कर चुके कर्मचारियों को अध्ययन अवकाश देय नहीं होता है। > अध्ययन अवकाश के दौरान विभाग से अनुपस्थितिः-
    24 माह + 04 माह (खाते के अवकाश)
    : 28 माह
    24 माह + 06 माह (असाधारण अवकाश) 30 माह
    अध्ययन अवकाश के दौरान सदैव अर्द्ध वेतन मिलता है।
    नियम 113:- अध्ययन अवकाशों की निरन्तरता में अन्य अवकाशों का समायोजन:-
    नियम 114: – अध्ययन अवधि के अध्ययन अवकाश से ज्यादा होने पर प्रक्रिया:- कर्मचारी अपने खाते के अवकाश या असाधारण अवकाश ले सकता है।
    नियम 115 :- अध्ययन अवकाश के लिए आवेदन पत्र:- अध्ययन अवकाश के लिए आवेदन पत्र लेखाधिकारियों या सहायक लेखाधिकारियों को दिये जाते है। आगे की स्वीकृति के लिए लेखाधिकारी जांच के बाद आवेदन पत्र विभागाध्यक्ष को भेजता है।
    नियम 116:- अध्ययन अवकाशों के साथ अन्य अवकाशों का समायोजन:-
    नियम 117:- अध्ययन भत्ता:- यदि कर्मचारी के द्वारा किया जा रहा अध्ययन सरकारी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हो तो सरकार कर्मचारी को अध्ययन अवधि के दौरान अलग से अध्ययन भत्ता स्वीकृत कर सकती है।
    नियम 118:- अध्ययन अवकाश के दौरान विश्रामकालः- इस नियम के तहत कर्मचारी को अध्ययन अवधि के दौरान सरकार द्वारा 14 दिन का विश्रामकाल देय होता है।

    नियम 119 :- अध्ययन शुल्क:- जिस अध्ययन के लिए कर्मचारी अवकाश पर जाता है, उस अध्ययन की किश्त कर्मचारी द्वारा ही देय होती है।
    यदि सक्षम अधिकारी अध्ययन की प्रवृति को अपने विभाग के लिए लाभदायक माने तो वह वित्त विभाग की मंजूरी लेकर उसे अध्ययन पाठ्यक्रम की किश्त का भुगतान कर सकता है
    नियम 120:– पाठ्यक्रम पूर्ण होने का प्रमाण पत्रः – कर्मचारी जिस अध्ययन के लिए अवकाश पर है, वह पूर्ण होने पर पाठ्यक्रम पूर्ण होने का प्रमाण पत्र विभाग को जमा कराना नैतिक दायित्व है।
    नियम 121 :- अध्ययन अवकाश की गणना पदोन्नति एवं पेंशन योग्य सेवा के तहत की जाती है।
    नियम 121(अ):- अवकाश अध्ययन के बदले सेवा का बन्ध पत्रः- इस नियम के तहत परिशिष्ट 18 में एक बन्ध पत्र भरवाया जाता है (दिनांक 31.05.2012 से लागु)
    परिशिष्ट 18 के तहत शर्त पूरी नहीं होने पर दूगनी राशि ब्याज सम्बन्धित विभाग को जमा करवाना होता है।
    नियम 122:- परिवीक्षाधीन को अवकाशः- वर्तमान में दिनांक 20.01.2006 के बाद ऐसा कोई पद राज्य सरकार में नहीं है।
    नियम 123 :- शिक्षार्थी को अध्ययन अवकाशः- इस नियम के तहत शिक्षार्थियों को अवकाश उसी अनुरूप देय होते है। जैसे विभाग में अस्थायी कर्मचारियों को देय होते है।
    नियम 103 की सीरीज के अन्तर्गत आने वाले अवकाश शिक्षार्थियों को देय नहीं होते है ।
    नियम 124:- अंशकालीन विधि अधिकारियों / प्राध्यापकों को अवकाश:-

    सामान्य तौर पर अंशकालीन रूप से नियुक्त प्राध्यापकों व विधि अधिकारियों को 02 वर्ष की सेवा पूर्ण करने पर 03 माह का अर्द्ध वेतन अवकाश देय होता है।
    एक साथ 03 माह का अधिकतम अवकाश देय होता है।
    → विपरीत परिस्थितियों में 06 वर्ष की सेवा पूर्ण हो तो 02 माह का अवकाश असाधारण अवकाश के रूप में स्वीकृत होगा ।
    नियम 125 :- अवकाश की निरन्तरता में अन्य अवकाशों का संयोजन:-
    नियम 126 :- दैनिक मानदेय व पारिश्रमिक के आधार पर नियुक्त होने वाले कर्मचारियों को
    अवकाश:-
    सामान्य तौर पर विभाग में 03 माह की सेवा पूर्ण करने पर ।
    03 माह पश्चात् 01 पूर्ण छूट्टी । यह अवकाश तभी स्वीकृत होता है जब श्रमिक अपनी जगह किसी अन्य श्रमिकों को काम के लिए नियुक्त करें।

    अध्याय-12
    कार्यग्रहण काल – 1981
    (नियम 127 से 140)
    राजस्थान सिविल सेवा कार्यग्रहण काल- 1981
    दिनांक 17 मार्च 1981 की अधिसूचना के आधार पर अध्याय 12 को ( नियम 127 – 140 ) विलोपित कर कार्यग्रहण काल नियम 1981 दिनांक 01 अप्रैल 1981 से प्रभावी हुए ।
    (अ) कार्यग्रहण काल किन पर लागु है:-
    राजस्थान के वह समस्त कर्मचारी जो आरएसआर के नियंत्रण में आते है, उन पर कार्यग्रहण काल
    नियम लागु है।
    अपवादः— 1. जो अनुबंध पर नियुक्त हो । 2. वर्कचार्ज्ड कर्मचारी। 3. वे कर्मचारी जो भुगतान आकस्मिक निधि से प्राप्त करें ।
    (ब) परिभाषाये:-

    1. विभागाध्यक्षः- (परिशिष्ट 14 ) आरएसआर के परिशिष्ट 14 में दी गई कर्मचारियों की सूची (वर्तमान में 51ए)
    2. कार्यग्रहण कालः– एक पद से दूसरे पद पर स्थानान्तरण होने पर कर्मचारी को नवीन पद पर कार्यग्रहण करने के लिए दिया गया समय ।
    3. स्थानान्तरणः- एक पद से दूसरे पद पर नियुक्त होना। 1. स्वयं की मर्जी 2. सरकार द्वारा
      (जनहित में) 3. अनुशासनात्मक
    4. कार्यग्रहण काल की देयता:- स्वेच्छा से स्थानान्तरण होने पर किसी प्रकार का कार्यग्रहण काल देय नहीं है।
      दिनांक 02.08.2005 के बाद स्थानान्तरण आदेश पर जनहित में शब्द अंकित होने पर कार्यग्रहण काल देय होता है।
      यदि कर्मचारी पर अनुशासनात्मक कार्यवाही के तहत स्थानान्तरण होता है तो उसे कार्यग्रहण काल सक्षम अधिकारी के विवेक पर देय होता है।
      यदि कर्मचारी का 180 दिन तक अस्थायी स्थानान्तरण होता है तो कर्मचारी को किसी भी प्रकार का कार्यग्रहण काल देय नहीं होता है।
    5. कालग्रहण काल में वेतन व भत्तेः- पूर्ण वेतन व पूर्ण भत्ते (यात्रा भत्ता को छोड़कर)
    6. अनुपयोगी कार्यग्रहण दिन:- यदि कर्मचारी कार्यग्रहण अवधि से पूर्व अपने नवीन पद पर कार्यभार ग्रहण कर लेता है तो उसके कार्यग्रहण अवधि के शेष बचे हुये दिन उसके उपार्जित अवकाश में जोड़ दिये जाते है ।
    7. कार्यग्रहण काल अवधि:- कर्मचारी का स्थानीय स्थानान्तरण होने पर 02 किमी. तक उसे 01 दिन का कार्यग्रहण काल देय होता है।
    8. लोकल 02 किमी तक 01 दिन
    9. स्थानीय परन्तु 200 किमी तक 10 दिन
    10. 3. 0 से 1000 किमी तक रेल से 10 din

    4. 0 से 1000 किमी तक बस से 12 दिन

    5. 1000 से 2000 किमी तक रेल से 12 दिन + बस से 15 दिन

    6. 2000 किमी. से अधिक 15 दिन
    7. जयपुर – जोधपुर में – 07 दिन (जिला कोषागार में )
    8. अन्य कोषागार में – 03 दिन
    उदाहरण:- दिनांक 16 को कोई स्थानान्तरण आदेश हो तो कार्यग्रहण काल 17 से प्रभावी होगा। 800 किमी – 10 दिन (दिनांक 17 से 26 तक) कार्यग्रहण सार्वजनिक अवकाश तो अगला दिन होगा।
    यह एक दिन की अवधि उसी स्थानीय स्थानान्तरण पर प्रभावी है, जिसमें कर्मचारी का आवास परिवर्तन न हो ।
    एपीओ के मामलें में 04 दिन का कार्यग्रहण काल देय है। (दूरी चाहे कितनी हो )
    यदि कर्मचारी के पास सरकारी भण्डारों का चार्ज है तो 07 दिन का कार्यग्रहण काल देय
    1
    8. कार्यग्रहण अधिक लेने पर सजा का प्रावधानः- सामान्य तौर पर नियत तिथि तक कोई कर्मचारी कर्मचारी नवीन पद पर कार्यभार ग्रहण न करे तो सम्बन्धित अधिकारी उसकी पिछली सेवा को जब्त कर सकता है।
    उपयुक्त कारण बता दे तो उसके द्वारा ज्यादा ली गई अवधि नियम 96 के तहत मानेगें । (असाधारण अवकाश)
    9. कार्यग्रहण काल की व्याख्या / संशोधनः – वित्त विभाग राज्यपाल की अनुमति के आधार पर कर सकता है।
    10. कार्यग्रहण काल में बढोतरी:- प्रारम्भिक स्तर पर कार्यग्रहण काल में बढ़ोतरी 30 दिन तक की विभागाध्यक्ष (परिशिष्ट – 9) के तहत कर सकता है। आगे यदि कोई बढ़ोतरी करनी हो तो वित्त विभाग कर सकता है। (30 दिन तक )
    बढ़ी हुई अवधि सदैव नियम 96 के तहत मानी जायेगी ।
    विपरीत परिस्थितियों में सक्षम अधिकारी की अनुमति से कार्यग्रहण काल में बढ़ोतरी । जैसे:- भुकम्प, तुफान, चक्रवात आदि के मामलों में
    कार्यग्रहण काल में सक्षम अधिकारी अपने विवेक के आधार पर बढ़ोतरी कर सकता है तथा विपरीत परिस्थितियों के तहत बढ़ा हुआ कार्यग्रहण काल पूर्व के कार्यग्रहण काल के समकक्ष देय होता है।
    11. कार्यग्रहण काल के दौरान सार्वजनिक अवकाशों का संयोजन:- यदि कार्यग्रहण के दौरान कोई सार्वजनिक अवकाश आदि हो तो उसे कार्यग्रहण काल में ही गिना जायेगा ।
    12. कार्यग्रहण काल के बाद वेतन व भत्ते प्राप्त करने की शर्त :-
    13. कार्यग्रहण अवधि का प्रारम्भ होना:- ये अवधि हमेशा स्थानान्तरण के अगले दिन से प्रभावी होती है।
    14. परिवीक्षाधीन प्रशिक्षणार्थी को कार्यग्रहण अवधिः- इनको सदैव यात्रा करने में लगा समय ही देय होता है।
    दिनांक 21.08.2007 के बाद कार्यग्रहण काल में वेतन व भत्ते (पूर्ण वेतन + भत्ते ) देय होगें।

    अध्याय-13 वैदेशिक सेवा
    (नियम 141 से 157)
    नियम 141:- वैदेशिक सेवा के लिए कर्मचारी की सहमतिः – (दिनांक 12.08.1960 से )

    किसी भी कर्मचारी का वैदेशिक सेवा में स्थानान्तरण बिना उसकी अनुमति के नहीं किया जायेगा ।
    यदि किसी कर्मचारी का वैदेशिक सेवा में (पंचायती राज व नगर निगम) स्थानान्तरण होता
    है, तो उस कर्मचारी की अनुमति लेना अनिवार्य नहीं है। (दिनांक 02.10.1959 से)
    नियम 142:- वैदेशिक सेवा में स्थानान्तरण करने की शर्त या मानकः- 1. सदैव सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए । 2. उन्हीं कर्मचारियों का जो पहले भुगतान संचित निधि से प्राप्त कर रहे
    हो ।
    नियम 143:- अवकाश काल में वैदेशिक सेवा में स्थानान्तरण के नियम:-

    1. कर्मचारी स्थानान्तरण होते ही अपने वेतन व भत्ते वैदेशिक नियोजक से प्राप्त करेगा ।
    2. यदि वैदेशिक सेवा में जिस कर्मचारी का स्थानान्तरण हुआ है, उसके मूल संवर्ग में यदि कोई साथी कर्मचारी पदोन्नति पाता है तो वैदेशिक सेवा से लौटने के बाद वह भी पदोन्नति का अधिकार रखेगा।
      नियम 144:– वैदेशिक सेवा में वेतन व भत्ते प्राप्त करने की शर्त :- स्थानान्तरण पश्चात् जिस दिन कार्यग्रहण करेगा, उसी दिन से वैदेशिक नियोजक से वेतन, भत्ते प्राप्त करेगा ।
      नियम 144 (अ):- वैदेशिक सेवा में प्रतिनियुक्ति की शर्तेंः- सामान्य तौर पर वैदेशिक सेवा में किसी कर्मचारी को 04 वर्ष के लिए प्रतिनियुक्ति पर भेजा जा सकता है। (3+1 प्रशासनिक विभाग) किसी भी विभाग में वैदेशिक सेवा में अधिकतम प्रतिनियुक्ति 05 वर्ष तक होती है।
      (4+1 वित विभाग)
      सीबीआई व रॉ के मामलों में सामान्य प्रतिनियुक्ति 05 वर्ष होती है। वित्त विभाग की आज्ञा से 02 वर्ष बढ़ा सकते है।
      वैदेशिक सेवा से लौटने के बाद कर्मचारी को अपने मूल विभाग में न्यूनतम 01 वर्ष की सेवा करना अनिवार्य है।
      वैदेशिक सेवा में किसी कर्मचारी का स्थानान्तरण होता है तो यह उसका व्यक्तिगत दायित्व है कि वह 15 दिन के भीतर अपने सर्विस रिकॉर्ड एजी कार्यालय में सत्यापन हेतु भेजे ।
      वैदेशिक सेवा से लौटने से 30 दिन पूर्व वैदेशिक नियोजक का यह दायित्व है कि वह कर्मचारी की अवधि पूर्ण होने की सूचना दे I
      वैदेशिक सेवा में स्थानान्तरण होने पर कर्मचारी को मूल+ ग्रेड पे वेतन का 2.5 प्रतिशत या अधिकतम 600 रू. प्रतिमाह भत्ता देय होता है।
      प्रतिनियुक्ति भत्ता अधिकतम 04 वर्ष तक देय होता है ।

    नियम 145:- वैदेशिक सेवा में पेंशन एवं अवकाश अंशदानः- इस नियम के तहत वैदेशिक सेवा से यदि किसी कर्मचारी का स्थानान्तरण होता है तो कुछ शुल्क जमा कराकर अपने अवकाश खाते व पेंशन खाते को संधारित करेगा ।

    परिशिष्ट 13 के तहत अवकाश एवं पेंशन अंशदान खाते निर्धारित किये जाते है ।
    यदि किसी कर्मचारी का पंचायती राज में स्थानान्तरण होता है तो कर्मचारी से अवकाश एवं पेंशन अंशदान नहीं लिया जायेगा। (दिनांक 02.10.1959 से)
    1956 से पूर्व बी श्रेणी के राज्यों में यदि वैदेशिक सेवा में स्थानान्तरण होता था तो वैदेशिक सेवा में कर्मचारी द्वारा व्यतीत किया गया समय पेंशन योग्य सेवा में माना जाता था।
    नियम 146 :- वैदेशिक सेवा में पेंशन अंशदान की दर:- सदैव 10 प्रतिशत मासिक के हिसाब से देय। कटौती / बढ़ोतरी वित्त विभाग के आदेशों से।
    नियम 147:- वैदेशिक सेवा में पेंशन व अवकाश अंशदान की गणना:- वैदेशिक सेवा में कर्मचारी जितना समय व्यतीत करता है, उतने समय के लिए ही वह वैदेशिक सेवा नियोजक से पेंशन अंशदान प्राप्त करेगा ।
    नियम 148:- वैदेशिक सेवा में अवकाश अंशदान से छूट:- सामान्य तौर पर वैदेशिक सेवा में कोई विशेष उपलब्धि अर्जित करने पर कर्मचारी से अवकाश व अंशदान लिये नहीं बल्कि दिये जाते है ।
    नियम 149:- वैदेशिक सेवा में पेंशन व अन्य अंशदान पर ब्याज:- वैदेशिक नियोजक द्वारा कर्मचारी के खाते में पेंशन व अन्य अंशदान जमा नहीं कराने पर उसके द्वारा 1 प्रतिशत ब्याज मासिक दर से दिया जायेगा ।
    नियम 150 :- वैदेशिक सेवा में पेंशन व अन्य अंशदान रोका नहीं जा सकता:-
    नियम 151 :- वैदेशिक सेवा में कर्मचारी अवकाश व पेंशन अंशदान सम्बन्धित अधिकारी की अनुशंषा पर ही ग्रहण करेगा व देगा।
    नियम 152 :- वैदेशिक सेवा में अवकाश:- मूल सेवा के अनुरूप ही देय है।
    नियम 153:- वैदेशिक सेवा में अवकाश से पहले अधिकारी की सहमतिः- अवकाश अधिकारी की अनुमति पर ही ।
    नियम 154:- वैदेशिक सेवा में कर्मचारी का अपने मूल विभाग में प्रतिनियुक्ति पर आना:- वैदेशिक सेवा के दौरान स्थानान्तरण पर अपने मूल पद के अनुरूप ही उस पद पर कार्य करेगा। वैदेशिक सेवा से लौटते ही अवकाश पर जाये तो सरकारी निर्देश के बाद कार्यग्रहण करेगा।

    नियम 155:- वैदेशिक सेवा से लौटने की तिथि:- जिस तिथि को अपना कार्यभार किसी अन्य को हस्तांतरण कर दे ।
    नियम 156 :- वैदेशिक सेवा में पेंशन व अंशदान बंद करने की तिथि:- जिस तिथि को अपना कार्यभार किसी अन्य को हस्तांतरण कर दे।
    नियम 157 :- नियमित संस्थापन्न कर्मचारियों को अपनी पुस्तिका एजी कार्यालय को प्रेषित करेगा:- ऐसे कर्मचारियों को भुगतान व अन्य राशियां सरकारी बजट के अलावा किसी अन्य स्रोत से देय ।
    विपरीत प्रतिनियुक्तिः – दिनांक 17 फरवरी 2007 के बाद इस पद का सर्जन किया गया। विपरीत प्रतिनियुक्ति के तहत सरकारी कर्मचारी को किसी प्राईवेट सेक्टर की कम्पनियों या विभागों में सेवा के लिये भेजा जाता है।

    सामान्य तौर पर विपरीत प्रतिनियुक्ति 01 वर्ष तथा बढ़ाकर 03 वर्ष तक ।
    वित्त विभाग की सलाह से ही प्रतिनियुक्ति में बढ़ोतरी ।
    कर्मचारी का सर्विस रिकॉर्ड मूल विभाग में ही रखा जायेगा।

    अध्याय-14
    स्थानीय निकायों के अधीन सेवा
    (नियम 158)
    नियम 158:- स्थानीय निधियों के अधीन सेवा:-
    स्थानीय निधियों के अधीन वह सेवा आती है, जिनका गठन सरकार के किसी अधिनियम या किसी अध्यादेश द्वारा हुआ हो ।

    राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम, रीको, कृषि विपणन, बिजली बोर्ड विश्वविद्यालय आदि ।
    स्थानीय निधियों के अधीन की गई सेवा को पेंशन योग्य सेवा आरएसआर में नहीं माना गया है।
    अपवाद:-
    आरएसआर के नियम संख्या 168 से 180 का पालन करने पर इनकी सेवाओं को पेंशन योग्य सेवा माना जा सकता है।
    कोई कर्मचारी 25 साल तक विभाग में निरन्तर सेवा कर रहा है तो उसका स्थानीय निधि में उसकी अनुमति के बिना स्थानान्तरण नहीं होगा।
    → यदि कोई कर्मचारी स्थानीय निधि पर प्रतिनियुक्ति पर कार्य कर रहा है तथा इस दौरान वह सेवानिवृत हो जाये तो अपने वेतन व भत्ते सम्बन्धित नियोजक से लेगा।

    अध्याय-15 सेवा अभिलेख
    (नियम 160 से 164)
    30 जनवरी 1981 के बाद अध्याय 15 को आरएसआर में प्रतिस्थापित किया गया ।
    नियम 160 :- सेवा अभिलेख:- कर्मचारी की नई नियुक्ति होने पर उसके सेवा सम्बन्धित रिकॉडों के संधारण के लिये सेवा पुस्तिका सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है।

    सेवा पुस्तिका की लागत सदैव सरकार द्वारा वहन किया जाता है।
    राजपत्रित अधिकारियों की सेवा पुस्तिका उस विभाग के विभागाध्यक्ष या ऊपरी अधिकारी रखते है।
    अराजपत्रित अधिकारियों की सेवा पुस्तिका कार्यालयाध्यक्ष के पास रहती है।
    सेवा पुस्तिका के अवलोकन के लिए कर्मचारियों को वर्ष में 02 बार मौका दिया जाता है। > कर्मचारियों की सेवा पुस्तिका उनके स्थानान्तरण होने पर नये विभाग को तुरन्त प्रभाव से भेज दी जाती है।
    नियम 161 :- सेवा पुस्तिका में इन्द्राज:-
    सेवा पुस्तिका में कर्मचारी से सम्बन्धित सूचनायें दर्ज की जाती है ।
    सेवा पुस्तिका में कर्मचारी की जन्मतिथि अंकों व शब्दों दोनों में लिखी जाती है तथा उस पर पारदर्शी टेप लगाई जाती है।
    कर्मचारी के पहचान सम्बन्धित दस्तावेजों की इस सेवा पुस्तिका में प्रविष्ठी की जाती है। > सेवाकाल के दौरान कर्मचारी द्वारा अर्जित विशेष योग्यता का सेवा पुस्तिका में इन्द्राज किया जाता है।
    एक कर्मचारी एक रूपयें की लागत पर सेवा पुस्तिका की डुप्लीकेट कॉपी (प्रतिलिपि) मांग कर सकता है।
    सेवा पुस्तिका में नियम 103 व 99 के तहत आने वाले अवकाशों का लाल स्याही से अलग से वर्णन होगा ।
    → यदि कर्मचारी की सेवा पुस्तिका (मूल) खो जाये तो उसकी प्रतिलिपि को आधार माना जाता है। (सक्षम अधिकारी के विवेक से)
    नियम 162 :- कर्मचारी के विदेश सेवा में स्थानान्तरण पर सेवापुस्तिका में प्रविष्ठी :- दिनांक 20.01.2006 के बाद राजस्थान में निदेशक अंकेक्षण अधिकारी के पद का सृजन किया गया। कर्मचारी का विदेश सेवा में स्थानान्तरण होता है तो सेवा पुस्तिका में महालेखाकार के आदेश पर निदेशक अंकेक्षण अधिकारी सेवा पुस्तिका सत्यापन करेगा।
    यदि कर्मचारी की विपरीत प्रतिनियुक्ति होती है तो सेवा पुस्तिका सदैव पैतृक विभाग में जमा होगी।
    नियम 163:- सेवा के 25 वर्ष पूर्ण होने पर सेवा पुस्तिका को निदेशक पेंशन विभाग में भेजा जाता है।
    कर्मचारी की सेवानिवृति पर सेवा पुस्तिका कर्मचारी को लौटाई नही जाती है।
    नियम 164: – सेवा विवरणिका:- चतुर्थ श्रेणी, अस्थायी, पुलिस के कानि व हैड कानि तक के अधिकारियों को सेवा विवरणिका देय होती है।
    उनके सभी पहचान, योग्यता, विशेष उपलब्धियां इसमें दर्ज की जाती है।

    अध्याय-16
    वित्तीय शक्तियों का प्रत्यायोजन
    (नियम 165 से 167)
    नियम 165 :- वित्तीय शक्तियों के उपयोग करने का अधिकार :- आरएसआर में वित्तीय शक्तियों का
    उपयोग सदैव 02 प्रकार से किया जा सकता है।
    परिशिष्ट 9 के तहत आने वाले समस्त अधिकारी वित्तीय शक्तियों का उपयोग कर सकते है। सरकार के विभाग के पास भी वित्तीय शक्तियों के उपयोग की अनुमति रहती है।
    नियम 166 :- वित्तीय शक्तियों के उपयोग से पहले वित्त विभाग की सहमतिः- आरएसआर में नियम 165 के तहत जो अधिकारी या विभाग वित्तीय शक्तियों का उपयोग कर सकते है, उन्हे सदैव पहले से ही एक निश्चित सीमा तक वित्त विभाग की आज्ञा देय होती है।
    नियम 167:- देय शक्तियों से अधिक अधिकार प्रयुक्त करने पर अनुशासनात्मक कार्यवाही:- किसी भी विभाग या परिशिष्ट 9 के तहत आने वाले अधिकारी सदैव उतनी ही वित्तीय शक्तियों का प्रयोग कर सकते है, जितनी वित्त विभाग द्वारा देय होती है।
    यदि किसी कारणवश देय से अधिक वित्तीय शक्तियों का उपयोग करते है तो वित्त विभाग द्वारा अनुशासनात्मक कार्यवाही की जायेगी।
    यदि अधिक शक्तियों के उपयोग का उचित कारण बता दे तो वित्त विभाग उन्हें इसकी अनुमति दे सकता है।
    अध्याय 16 से महत्वपूर्ण तथ्य
    मानदेय की दर:- मानदेय की दर अधिकतम 12 प्रतिशत तक हो सकती है।

    01 से 59 तक

    • 1 प्रतिशत
      60 से 119 तक – 2 प्रतिशत
      120 से 179 तक
    • 4 प्रतिशत
      180 से 239 तक – 6 प्रतिशत
      जिले में प्राकृतिक आपदा घोषित करने का अधिकार परिशिष्ट 9 के तहत जिला कलेक्टर को होता है।
      भारत में ही यदि कोई कर्मचारी प्रशिक्षण पर है तो उसके प्रशिक्षण को (नियम 7 (8) के तहत ड्यूटी माना जाता है ।)
      एपीओ को ड्यूटी (30 दिन अधिकतम) पर माना जाता है। (नियम 7 (8) ( स ) )
      यदि कोई मृतक आश्रित अनुकम्पा नियुक्ति के बाद आगे अध्ययन हेतु (बी.एड. बीएसटीसी) अवकाश लेना चाहे तो नियम 96 के तहत परिशिष्ट 9 में आने वाले अधिकारी उसे असाधारण अवकाश दे सकते है।
      वित्तीय शक्तियों का विस्तार सदैव वित्त विभाग ही कर सकता है। परिशिष्ट 9 में आने वाले अधिकारी अस्थायी पदों का सृजन (IV) तक कर सकते है तथा यह 6 माह तक इन पदों का सर्जन कर सकते है। पद के आगे का विस्तार सदैव वित्त विभाग की सलाह पर ही होगा।

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